ओवैसी ने कहा कि अगर संबंधित पक्ष जिनेवा समझौते जैसी कूटनीतिक प्रक्रियाओं पर सहमत होते, तो हालात इस मुकाम तक नहीं पहुंचते। उन्होंने दावा किया कि हमलों में 200 से अधिक लोगों की जान गई है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया। उनके मुताबिक, खामेनेई की हत्या न केवल एक राजनीतिक घटना है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।
उन्होंने भारत सरकार से भी स्पष्ट रुख अपनाने की अपील की। ओवैसी ने कहा कि भारत को इस युद्ध को समाप्त करने का आह्वान करना चाहिए और खामेनेई की मौत की निंदा करनी चाहिए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पश्चिम एशिया में करीब एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, ऐसे में वहां की अस्थिरता सीधे तौर पर भारतीय नागरिकों को प्रभावित कर सकती है।
ओवैसी ने अपने बयान में इजरायल और पाकिस्तान का जिक्र करते हुए कहा कि जिस तरह इजरायल ने ईरान पर हमला किया और पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में कार्रवाई की, उससे यह संकेत मिलता है कि दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में तनाव बढ़ाने वाली ताकतें बनते जा रहे हैं।
इधर, खामेनेई की मौत की खबर के बाद भारत के कई हिस्सों में शिया समुदाय के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए। कश्मीर घाटी में श्रीनगर के लाल चौक, सैदा कदल, बडगाम, बांदीपोरा, अनंतनाग और पुलवामा जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रशासन को कई स्थानों पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने पड़े। अनुमान है कि कश्मीर में करीब 15 लाख शिया मुसलमान रहते हैं, जिनमें इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश और शोक देखा गया।
पंजाब के लुधियाना में भी शिया समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किए और पुतले फूंके। इन प्रदर्शनों का नेतृत्व शाही इमाम मौलाना मोहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने किया। अजमेर में शिया समुदाय ने तीन दिन के शोक की घोषणा की और दरगाह इलाकों में शोक सभाएं आयोजित की गईं। दिल्ली, बिहार, झारखंड और तेलंगाना में भी श्रद्धांजलि सभाएं और विरोध कार्यक्रम हुए।
वहीं पाकिस्तान के कराची में अमेरिकी दूतावास के बाहर भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। वहां प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प की खबर है, जिसमें आठ लोगों की मौत और 30 से अधिक लोगों के घायल होने की सूचना है।
कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने न केवल मिडिल ईस्ट बल्कि दक्षिण एशिया तक राजनीतिक और सामाजिक हलचल बढ़ा दी है। नेताओं के बयान, सड़कों पर उतरते लोग और कूटनीतिक बयानबाजी इस बात का संकेत हैं कि आने वाले दिनों में हालात और संवेदनशील बने रह सकते हैं।
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